जानें कौन था देश का पहला मुस्लिम, जिसने छेड़ी थी तीन तलाक के ख़िलाफ़ जंग

आज से 50 साल पहले एक एंग्री यंग सेक्युलिरीस्ट ने ट्रिपल तलाक को खत्म करने के लिये संघर्ष की शुरुआत की थी

तीन तलाक़ को अवैध करार देने वाले ट्रिपल तलाक़ बिल को लोकसभा में विपक्षियों के हंगामे के बीच पास हुआ. इस बिल के जल्द पास होने के रास्ते साफ होते देखे जा रहे हैं, इस बीच एक दशकों पुरानी कहानी का ज़िक्र ज़रूरी है. कम लोग जानते हैं कि 50 साल पहले एक सेक्युलरिस्ट ने ट्रिपल तलाक को खत्म करने के लिये संघर्ष की शुरुआत की थी. लेकिन सच यह है कि तीन तलाक के पहले आंदोलनकारी को भुला दिया गया है.

कौन था ये शख्स और क्या हैं उसकी संघर्ष गाथाइस आंदोलनकारी का नाम था हमीद दलवाई जिसने 60 और 70 के दशक में तीन तलाक के खिलाफ आवाज़ बुलंद की थी. हमीद ने ही मुस्लिम महिलाओं को ये हिम्मत दी की तलाक-ए-बिद्दत यानी इंस्टेंट तलाक के खिलाफ घरों से बाहर निकलें. हमीद ने महिलाओं को अपने लिए आवाज़ उठाने के लिए जागरूक किया था.

1966- जब पहली बार तीन तलाक के खिलाफ़ उठी आवाज़1966 में मुंबई में विधानसभा के पास एक मार्च निकाला गया. महिलाओं की हाथों में ट्रिपल तलाक खत्म करने को लेकर बैनर और पर्चे थे जिसका नेतृत्व कर रहे थे हमीद दलवाई. ट्रिपल तलाक के खिलाफ सड़कों पर विरोध प्रदर्शन का ये पहला मामला था.
इस मार्च में केवल 7 महिलाएं थीं, जो तीन तलाक की शिकार हुई थी. महज 7 महिलाओं के मोर्चे की ये खबरे जब अगले दिन अखबारों की सुर्खियां बनीं तो मुस्लिम समाज में खलबली मची. रातों रात हमीद दलवाई सुर्खियों में आ गए.

जब पिता ने चौथी शादी की तो हमीद नाराज़ होकर मुंबई चले गए और समाज कल्याण से जुड़े आंदोलनों में हिस्सा लेने लगे. तीन तलाक मुद्दे से उस समय रुबरु हुए जब हमीद के एक दोस्त की बहन को 18 साल की उम्र में ही तलाक मिला था. बस यही से हमीद दलवाई ने तीन तलाक के खिलाफ जंग छेड़ दी.

हमीद ने देश के संविधान को पर्सनल लॉ पर तरजीह दी. हमीद ने सबसे पहले मुस्लिम महिलाओं को कानूनी जानकारी देनी शुरु की ताकि औरतें अपने हक़ को लेकर जागरुक बन सकें. हमीद ने मुस्लिम सत्यशोधक समाज की स्थापना की, जिसका मकसद था तीन तलाक को खत्म करके महिलाओं को समान अधिकार देना.

जब पहली बार मुस्लिम महिलाओं  तीन तलाक के खिलाफ आवाज़ उठाईहमीद की अगुवाई में देश में पहली बार मुस्लिम महिलाओं ने बेखौफ होकर तीन तलाक के खिलाफ बोला. 1970 में मुस्लिम महिलाओं ने एक प्रेस कांफ्रेंस के जरिये तीन तलाक के खिलाफ आवाज उठाई.

बौखलाए विरोधी भी हमीद की इस मुहिम के विरोध में उतर पड़े, इसके बाद हमीद के खिलाफ आंदोलन शुरु हो गए. उनकी सभाओं में पथराव तक किया जाने लगा साथ ही, कई बार उनपर जानलेवा हमला भी हुआ. हमीद की ये पहल मौलवियों को रास नहीं आई जिसका खामियाजा हमीद के साथ उनके परिवार को भुगतना पड़ा.

आखिरकार रंग लाई हमीद दलवाई की मुहिम
विरोध और प्रदर्शन के दौर में हमीद दलवाई की मुहिम रंग लाई और बात दिल्ली तक पहुंच गई. उस समय राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी इस मुहिम की तारीफ की. तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तो यहां तक कह दिया था कि हिंदू समाज को भी एक दलवाई चाहिए.

मौत के बाद मुहिम की कमान बीवी ने संभाल ली
1977 में हमीद की किडनी की गंभीर बीमारी से मौत हो गई. हमीद दलवाई की मौत के बाद भी आंदोलन थमा नहीं. उनकी बीवी मेहरुनिसा ने मुस्लिम सत्यशोधक समाज के काम को आगे जारी रखा.


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