तुलसी का पुनर्जन्म हुआ
--डॉ. राजेश त्रिवेदी
तुलसी का पुनर्जन्म हुआ, यह बात उनके जन्म के साठ साल तक लोग नहीं जान पाये। जैसे सामान्य बालक जन्म लेते हैं उसी तरह इस बालक का भी जन्म हुआ। एक सामान्य बालक की भांति ही उसने पढाई लिखाई की तथा उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन नौकरी करके अपना जीवन यापन किया। सेवानिवृत्त के बाद जब उनकी पत्नी ने उन्हें बार बार उनके पूर्व जन्म की याद दिलाई तब उन्होंने छन्द रामायण छन्द भागवत सरस रामायण राम चरित मन्दाकिनी छन्द गीता हनुमान रामायण विनय की पाती महेश दोहावली आदि अनेक ग्रन्थों की रचना कर डाली।सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने इस जन्म में रामायण गीता भागवत आदि ग्रन्थ न तो कभी पढे थे और ना ही कभी बैठकर उन्हें सुना ही था। पत्नी के द्वारा बार बार पूर्व जन्म की याद दिलाने पर ही यह चमत्कार हुआ। जन्म अब मैं सबसे पहले इनके जन्म के बारे में बतलाना चाहता हूं। उत्तर प्रदेश के जनपद इटावा के गांव ईकरी लखना के निवासी पंडित रामाधार शुक्ल एवं श्रीमती त्रिवेणी देवी जी के कनिष्ठ पुत्र के रूप में इनका जन्म इनकी माता जी की ननिहाल में पावन यमुना नदी के दक्षिण तट पर बसे आगरा जनपद के गांव राजा के नौगांव में
गोस्वामी तुलसीदास का पुनर्जन्म अगहन शुक्ल पक्ष दशमी तदनुसार दिनांक सात दिसम्बर 1932 ईस्वी को प्रातःकाल पांच बजे रेवती मूल नक्षत्र में हुआ। माता पिता ने इस बालक का नाम महेश रखा। महेश में बाल्य काल से ही बड़े विलक्षण लक्षण प्रकट होने लगे थे। जब बालक महेश लगभग दो वर्ष का था तब उसकी माता जी उसे नहला धुला कर घर के आंगन में एक छोटी चारपाई पर लिटा देती थीं और वे अपने गृह कार्य में व्यस्त हो जातीं थीं। जब यह बालक चारपाई पर लेटे लेटे दीवार की ओर करवट लेता था तो उसे दीवार पर सभी देवता दिखाई देने लगते थे। बालक महेश उन्हीं के साथ खेलता रहता था। जब कोई व्यक्ति उस बालक के पास आता तो वे देवगण अदृश्य हो जाते थे। जब बालक अकेला होता था तो वे सभी देवता उस बालक की रक्षा किया करते थे। नौगांव के इष्ट देव घाट वाले बाबा जी हैं। यमुना नदी के किनारे उनका एक छोटा सा मन्दिर बना हुआ है उसमें उनकी कोई मूर्ति नहीं है वे अदृश्य रहकर ही सबके ऊपर कृपा की वर्षा करते रहते हैं। बालक महेश के ऊपर सदा ही उनकी बड़ी कृपा रही है। बचपन में समाधि जब बालक महेश मात्र पांच साल का था तब उसकी समाधि लग गई थी। महेश के पैत्रिक गांव ईकरी में इनके पिताजी को भी नहीं आभास था कि उनके घर तुलसी का पुनर्जन्म हुआ। यह बात उनके जन्म के साठ साल तक लोग नहीं जान पाये। जैसे सामान्य बालक जन्म लेते हैं उसी तरह इस बालक का भी जन्म हुआ। एक सामान्य बालक की भांति ही उसने पढाई लिखाई की तथा उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन नौकरी करके अपना जीवन यापन किया। सेवानिवृत्त के बाद जब उनकी पत्नी ने उन्हें बार बार उनके पूर्व जन्म की याद दिलाई तब उन्होंने छन्द रामायण छन्द भागवत सरस रामायण रामचरित मन्दाकिनी छन्द गीता हनुमान रामायण विनय की पाती महेश दोहावली आदि अनेक ग्रन्थों की रचना कर डाली।सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने इस जन्म में रामायण गीता भागवत आदि ग्रन्थ न तो कभी पढे थे और ना ही कभी बैठकर उन्हें सुना ही था। पत्नी के द्वारा बार बार पूर्व जन्म की याद दिलाने पर ही यह चमत्कार हुआ। जन्म. अब मैं सबसे पहले इनके जन्म के बारे में बतलाना चाहता हूं। उत्तर प्रदेश के जनपद इटावा के गांव ईकरी लखना के निवासी पंडित रामाधार शुक्ल एवं श्रीमती त्रिवेणी देवी जी के कनिष्ठ पुत्र के रूप में इनका जन्म इनकी माता जी की ननिहाल में पावन यमुना नदी के दक्षिण तट पर बसे आगरा जनपद के गांव राजा के नौगांव में पंडित रामाधार शुक्ल जी का दो मंजिल का मकान बना हुआ है। उसकी सबसे ऊपर की छत पर जाने के लिए कोई जीना नहीं बना था। घर के मुख्य द्वार के साम ने उत्तर दिशा की ओर एक जल कूप है तथा उसके पार्श्व में एक पक्के चबूतरे पर एक शिव लिंग स्थापित है। लोग स्नान करने के बाद बड़े श्रद्धा भाव से ओम नमः शिवाय मंत्र का जप करते शिवलिंग पर जल चढ़ाते थे। बालक महेश बड़े भक्ति भाव से उन लोगों को देखा करता और वह भी ओम नमः शिवाय मंत्र जपने लगता। एक दिन प्रातःकाल छै बजे जागकर बालक महेश दीवार में बने कसका पकड़ कर अपने दो मंजिला मकान की छत पर चढ़ गया और उत्तर दिशा की ओर मुंह करके नेत्र बन्द करके बैठ गया तथा ओम नमः शिवाय मंत्र का जप करने लगा। उसे पता ही नहीं चला कि कब उसकी समाधि लग गयी। वह देहभान भूलकर समाधि में परमानन्द प्राप्त कर रहा था। महेश के पिता जी पंडित रामाधार शुक्ल जी का सम्मिलित परिवार था। उनके अनुज श्री अनन्त माधव शुक्ल जी का परिवार भी उन्हीं के साथ रहता था। उन दोनों भाइयों में आपस में बहुत प्रेम था। जब प्रातःकालीन स्वल्पाहार तैयार हुआ तो परिवार के सभी बच्चों को बुलाकर स्वल्पाहार दिया जाने लगा। माता ने देखा कि परिवार के सभी बच्चे तो उपस्थित हैं किन्तु महेश नहीं दिखाई दे रहा है। कई बार उसे पुकारा गया किन्तु कोई उत्तर नहीं मिलने से परिवार के सभी लोग चिंतित होकर महेश को इधर-उधर ढूंढने लगे। पूरे गांव में कुंएं तालाब खेत सब जगह उसे ढूंढा गया किन्तु महेश कहीं नहीं मिला तब उसके चाचा जी ने कहा कि सब स्थानों पर तो उसे खोज चुके हैं किन्तु सबसे ऊपर है वाली छत पर खोज नहीं की गई है। यह कहकर वे उस छत पर गये तो देखा कि महेश वहां समाधि लगाये बैठा है। उन्होंने महेश को झकझोर कर समाधि से जगा दियाऔर उसे पकड़ कर सबके पास नीचे लाये और कहा यह छत पर बैठा मंत्र जाप कर रहा था। समाधि टूटने पर महेश व्याकुल होकर रोने लगा और कहा मैं बड़े आनन्द में था। मुझे यहां कहां लाकर पटक दिया। महेश को पाकर पूरा परिवार बहुत प्रसन्न हुआ किन्तु महेश को प्राप्त होने वाले परमानन्द को कोई नहीं जान पाया। गीता में जब भगवान् श्रीकृष्ण से अर्जुन ने पूछा था कि जब कोई तपस्वी अपनी तपस्या पूरी नहीं कर पाता है और बीच में ही उसकी मृत्यु हो जाती है तो ऐसे योगभृष्ट तपस्वी की क्या गति होती है। सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण ने बताया कि जिन तपस्वियों की तपस्या पूरी होने से पहले ही मृत्यु हो जाती है उनका अगला जन्म किसी धर्मात्मा कुलीन भक्त के परिवार में होता है वहाँ मैं उस तपस्वी को उसकी अधूरी तपस्या पूरी करने का अवसर प्रदान करता हूं तब वह तपस्वी अपनी अधूरी तपस्या पूर्ण करके मुझे प्राप्त कर लेता है। लगता है कि महेश को भी अपनी अधूरी तपस्या पूर्ण करने का शुभ अवसर भगवान् ने प्रदान किया है। विवाह हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करते ही महेश का विवाह इटावा जनपद के सिरसा गांव के निवासी पंडित विजय बहादुर जी की कनिष्ठ पुत्री शकुन्तला जी के साथ मई सन उन्नीस सौ इक्यावन में कर दिया गया। उस समय शकुंतला जी की उम्र मात्र तेरह वर्ष की तथा महेश जी की उम्र उन्नीस वर्ष थी। इतनी छोटी उम्र में भी शकुन्तला जी अपने पति को परमेश्वर मानकर पूरी निष्ठा के साथ पतिव्रत धर्म का पालन करती थीं। उनकी अपार पति भक्ति देखकर एक दिन महेश जी ने उनसे पूछा कि अभी आप मात्र तेरह वर्ष की ही हैं। आपकी माता जी की मृत्यु आपके बचपन में ही होगयी थी। आपको उनकी याद भी नहीं है कि वे कैसी थी। आपकी भाभी जी भी अभी बहुत छोटी हैं वे भी अभी मात्र चौदह वर्ष की ही हैं। आपको इस पतिव्रत धर्म का गूढ़ रहस्य किसने बतलाया। शकुन्तला जी ने कहा कि बचपन में मेरे बड़े भाई ने सती अनुसुइया नामक फिल्म दिखलाई थी। उसमें सती अनुसुइया जी के कठिन पतिव्रत धर्म तथा तप को देखकर मैं बहुत प्रभावित हुई थी। तभी मैंने हृदय में दृढ़ निश्चय कर लिया था कि मेरा विवाह होने पर मैं भी सती अनुसुइया जी की भांति ही अपने पति देव को परमेश्वर मानकर उनकी सेवा कर के पतिव्रत धर्म का पालन करुंगी। राजकीय सेवा सन 1954 में एक सामान्य युवा की भांति ही महेश जी का चयन उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन ग्राम विकास विभाग में होगया। वहां छत्तीस वर्ष से अधिक सेवा करते हुए सन 1990 में अपर परियोजना निदेशक पद से सेवानिवृत्त होकर 10/223 आनंद नगर शुक्ला गंज उन्नाव उ प्र में निवास करने लगे। भगवान् के चतुर्भुज रूप के दर्शन जब महेश जी विकास खंड सरसौल कानपुर में खंड विकास अधिकारी पद पर कार्यरत थे तभी अचानक वे बहुत बीमार हुए और उन्हे उर्सला अस्पताल में भर्ती कराया गया। लगता था कि उनका प्राणान्त हो जायेगा। उसी समय भगवान् चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए। महेश जी ने अपनी पत्नी से कहा कि मैं तो इस संसार को छोड़कर जारहा हूँ। आप मेरे साथ ही चलेगी या बाद मे आयेंगी। पत्नी ने कहा कि पहले घाट वाले बाबा महाराज से पूछ लूं। वे जैसा कहेंगे वैसा ही किया जाये। उन्होंने बाबा महाराज का आवाहन किया। उन्होंने प्रकट होकर कहा अभी महेश को यहीं पृथ्वी पर रहकर बहुत महान कार्य करना है। इतना कहकर बाबा महाराज अन्तर्धान होगये। चतुर्भुज रूप भगवान् जी महेश जी के पास लगभग डेढ़ घंटे तक रहे। उस समय महेश जी को परमानन्द प्राप्त होरहा था। उनके अन्तर्धान होते ही महेश जी व्याकुल हो गये। रोग मुक्त हो कर वे राजकीय सेवा में व्यस्त हो गए किन्तु सेवा निवृत्त होने तक वे यह नहीं जान सके कि कौन सा महान कार्य करने के लिए बाबा महाराज ने आदेश दिया था। छन्द रामायण छन्द भागवत आदि अनेक ग्रन्थों की रचना सेवा निवृत्त होने के बाद अभी कुछ दिन ही व्यतीत हुए थे। सन 1991 के श्रावण मास का पहला सोमवार था। यह अद्भुत संयोग ही था कि उस दिन श्रावण कृष्ण पक्ष की तृतीया तदनुसार गोस्वामी तुलसीदास जी की पुण्यतिथि थी। महेश जी अपने आवास में बैठे हुए थे तभी उनकी पत्नी शकुंतला जी ने आकर उनसे कहा कि आप मुझे रामकथा सुनाइये। महेश जी ने उनसे कहा मैं तो राम कथा जानता ही नहीं हूं। मैंने रामायण न तो कभी पढी है और ना ही उसे किसी सन्त के मुखारविन्द से सुनने का ही सौभाग्य प्राप्त हुआ है। मुझे राम कथा नही आती है मै आपको नहीं सुना पाऊंगा। यह सुनकर उनकी पत्नी ने कहा आप तो रामायण के रचयिता हैं। पिछले जन्म में भी मैं आपकी पत्नी थीं। आप राम भक्ति प्राप्त करने के लिए मुझे छोड़ कर चले गये थे तब आपने रामायण की रचना की थी। आप काशी में रहते थे। मैं आपको ढूंढती हुई काशी पहुंची थी तब आपने मुझे अपने पास रखने से मना कर दिया था। जब मैंने आपसे मुझे राम कथा सुनाने का आग्रह किया तब आपने मुझे वचन दिया था कि इस जन्म में तो मैं तुम्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर के रामकथा नहीं सुना पाऊंगा। यदि राम जी ने अगले किसी जन्म में हम दोनों को पति पत्नी के रूप में मिलाया तो मैं रामायण की रचना करके तुम्हें अवश्य सुनाऊंगा। महेश जी ने उनसे कहा कि मुझे तो पूर्व जन्म का कुछ भी याद नहीं है। रामकथा मुझको आती भी नहीं है तुमको कैसे सुनाऊं। जब शकुंतला जी ने उनको पूर्व जन्म की बार बार याद दिलाई तो महेश जी के सामने राम कथा छन्द रामायण के रुप में प्रकट होने लगी तथा उन्होंने उसे अपनी पत्नी को सुनाया और उसे लिपिबद्ध किया जो ब्रज भाषा की प्रथम रामायण घोषित हुई। इस पर तत्कालीन राष्ट्रपति जी डा. शंकरदयाल शर्मा जी ने महेश जी को राष्ट्रपति भवन में बुलाकर आदर प्रदान किया। छन्द रामायण की रचना के बाद छन्द भागवत महापुराण छन्द गीता रामचरित मन्दाकिनी सरस रामायण हनुमान रामायण बाल रामायण छन्द गोरखनाथ पुराण विनय की पाती महेश दोहावली आदि अनेक ग्रन्थ प्रकट होगये उन्हें महेश जी ने लिपि बद्ध किया। उनका यश देश विदेश में फैलने लगा। महेश जी के ग्रन्थों पर अनेक विश्वविद्यालयों में शोधकर्ताओं ने शोध करके पी एचडी की उपाधि प्राप्त की है। देश विदेश के अनेक महान व्यक्तियों ने महेश जी की बड़ी प्रशंसा की है। चित्रकूट में वनवासी राम जी के दर्शन महेश जी चित्रकूट में नेत्र बन्द किये हुए सीताराम मंत्र का जप करते हुए कामद गिरि की परिक्रमा कर रहे थे अभी दो मुखारविन्द ही पार कर पाये थे कि सामने से कर्णप्रिय शब्द सुनाई पडा़ रुकिए। महेश जी ने नेत्र खोल दिये तो देखा कि सामने एक बहुत ही सुन्दर सांवले रंग के तपस्वी वेश में तेजस्वी युवा खड़े हुए हैं। उन्होंने महेश जी से पूछा क्या चाहते हो तो महेश जी ने कहा रामजी के दर्शन करना चाहता हूं। यह सुनकर उन्होंने मधुर मुस्कान के साथ कृपा दृष्टि से महेश जी की ओर देखा। ज्यौंही महेश जी ने उनके चरणों में अपना शीश झुकाया वे अन्तर्धान होगये। हनुमान जी के दर्शन महेश जी को दो बार हनुमानजी के दर्शन हुए। प्रथम बार चित्रकूट में कामद गिरि की परिक्रमा करते समय तथा दूसरी बार श्रंगबेरपुर में प्रवास के समय। महेश जी बहुत दुखदायी कैंसर रोग से पीड़ित हो गये थे हनुमानजी ने उनका कैंसर ठीक कर दिया उसके बाद महेश जी ने अनेक ग्रन्थों की रचना की। महान व्यक्तियों द्वारा प्रशंसा तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा जी के भारत रत्न श्री अटलबिहारी वाजपेयी जी सर्वोच्च न्यायालय के सेनि प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री रमेश चंद्र लाहोटी जी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री प्रेम शंकर गुप्त जी उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्पपाल आचार्य श्री विष्णु कान्त शास्त्री जी पद्म विभूषण स्वामी राम भद्राचार्य जी जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपा नन्द जी सहित देश विदेश के अनेक विद्वानों ने महेश जी की प्रशंसा की है। महेश जी अपनी साधना में लीन रहते हैं तथा प्रचार प्रसार से दूर रहते हैं इस कारण उन्हें कम लोग ही जानते हैं। वे न तो किसी को अपना शिष्य बनाते हैं और ना ही किसी से कोई चन्दा या दान स्वीकार करते हैं। विद्वानों द्वारा गोस्वामी तुलसीदास जी से महेश जी की तुलना करना जो विद्वान महेश जी के कृतित्व तथा व्यक्तित्व से परिचित हैं वे महेश जी की तुलना गोस्वामी तुलसीदास जी से करने लगते हैं। लोग जो महेश जी और तुलसी दास जी की समानता बतलाते हैं उसके कुछ उदाहरण नीचे प्रस्तुत कर रहा हूं।
गोस्वामी तुलसीदास का पुनर्जन्म अगहन शुक्ल पक्ष दशमी तदनुसार दिनांक सात दिसम्बर 1932 ईस्वी को प्रातःकाल पांच बजे रेवती मूल नक्षत्र में हुआ। माता पिता ने इस बालक का नाम महेश रखा। महेश में बाल्य काल से ही बड़े विलक्षण लक्षण प्रकट होने लगे थे। जब बालक महेश लगभग दो वर्ष का था तब उसकी माता जी उसे नहला धुला कर घर के आंगन में एक छोटी चारपाई पर लिटा देती थीं और वे अपने गृह कार्य में व्यस्त हो जातीं थीं। जब यह बालक चारपाई पर लेटे लेटे दीवार की ओर करवट लेता था तो उसे दीवार पर सभी देवता दिखाई देने लगते थे। बालक महेश उन्हीं के साथ खेलता रहता था। जब कोई व्यक्ति उस बालक के पास आता तो वे देवगण अदृश्य हो जाते थे। जब बालक अकेला होता था तो वे सभी देवता उस बालक की रक्षा किया करते थे। नौगांव के इष्ट देव घाट वाले बाबा जी हैं। यमुना नदी के किनारे उनका एक छोटा सा मन्दिर बना हुआ है उसमें उनकी कोई मूर्ति नहीं है वे अदृश्य रहकर ही सबके ऊपर कृपा की वर्षा करते रहते हैं। बालक महेश के ऊपर सदा ही उनकी बड़ी कृपा रही है। बचपन में समाधि जब बालक महेश मात्र पांच साल का था तब उसकी समाधि लग गई थी। महेश के पैत्रिक गांव ईकरी में इनके पिताजी को भी नहीं आभास था कि उनके घर तुलसी का पुनर्जन्म हुआ। यह बात उनके जन्म के साठ साल तक लोग नहीं जान पाये। जैसे सामान्य बालक जन्म लेते हैं उसी तरह इस बालक का भी जन्म हुआ। एक सामान्य बालक की भांति ही उसने पढाई लिखाई की तथा उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन नौकरी करके अपना जीवन यापन किया। सेवानिवृत्त के बाद जब उनकी पत्नी ने उन्हें बार बार उनके पूर्व जन्म की याद दिलाई तब उन्होंने छन्द रामायण छन्द भागवत सरस रामायण रामचरित मन्दाकिनी छन्द गीता हनुमान रामायण विनय की पाती महेश दोहावली आदि अनेक ग्रन्थों की रचना कर डाली।सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने इस जन्म में रामायण गीता भागवत आदि ग्रन्थ न तो कभी पढे थे और ना ही कभी बैठकर उन्हें सुना ही था। पत्नी के द्वारा बार बार पूर्व जन्म की याद दिलाने पर ही यह चमत्कार हुआ। जन्म. अब मैं सबसे पहले इनके जन्म के बारे में बतलाना चाहता हूं। उत्तर प्रदेश के जनपद इटावा के गांव ईकरी लखना के निवासी पंडित रामाधार शुक्ल एवं श्रीमती त्रिवेणी देवी जी के कनिष्ठ पुत्र के रूप में इनका जन्म इनकी माता जी की ननिहाल में पावन यमुना नदी के दक्षिण तट पर बसे आगरा जनपद के गांव राजा के नौगांव में पंडित रामाधार शुक्ल जी का दो मंजिल का मकान बना हुआ है। उसकी सबसे ऊपर की छत पर जाने के लिए कोई जीना नहीं बना था। घर के मुख्य द्वार के साम ने उत्तर दिशा की ओर एक जल कूप है तथा उसके पार्श्व में एक पक्के चबूतरे पर एक शिव लिंग स्थापित है। लोग स्नान करने के बाद बड़े श्रद्धा भाव से ओम नमः शिवाय मंत्र का जप करते शिवलिंग पर जल चढ़ाते थे। बालक महेश बड़े भक्ति भाव से उन लोगों को देखा करता और वह भी ओम नमः शिवाय मंत्र जपने लगता। एक दिन प्रातःकाल छै बजे जागकर बालक महेश दीवार में बने कसका पकड़ कर अपने दो मंजिला मकान की छत पर चढ़ गया और उत्तर दिशा की ओर मुंह करके नेत्र बन्द करके बैठ गया तथा ओम नमः शिवाय मंत्र का जप करने लगा। उसे पता ही नहीं चला कि कब उसकी समाधि लग गयी। वह देहभान भूलकर समाधि में परमानन्द प्राप्त कर रहा था। महेश के पिता जी पंडित रामाधार शुक्ल जी का सम्मिलित परिवार था। उनके अनुज श्री अनन्त माधव शुक्ल जी का परिवार भी उन्हीं के साथ रहता था। उन दोनों भाइयों में आपस में बहुत प्रेम था। जब प्रातःकालीन स्वल्पाहार तैयार हुआ तो परिवार के सभी बच्चों को बुलाकर स्वल्पाहार दिया जाने लगा। माता ने देखा कि परिवार के सभी बच्चे तो उपस्थित हैं किन्तु महेश नहीं दिखाई दे रहा है। कई बार उसे पुकारा गया किन्तु कोई उत्तर नहीं मिलने से परिवार के सभी लोग चिंतित होकर महेश को इधर-उधर ढूंढने लगे। पूरे गांव में कुंएं तालाब खेत सब जगह उसे ढूंढा गया किन्तु महेश कहीं नहीं मिला तब उसके चाचा जी ने कहा कि सब स्थानों पर तो उसे खोज चुके हैं किन्तु सबसे ऊपर है वाली छत पर खोज नहीं की गई है। यह कहकर वे उस छत पर गये तो देखा कि महेश वहां समाधि लगाये बैठा है। उन्होंने महेश को झकझोर कर समाधि से जगा दियाऔर उसे पकड़ कर सबके पास नीचे लाये और कहा यह छत पर बैठा मंत्र जाप कर रहा था। समाधि टूटने पर महेश व्याकुल होकर रोने लगा और कहा मैं बड़े आनन्द में था। मुझे यहां कहां लाकर पटक दिया। महेश को पाकर पूरा परिवार बहुत प्रसन्न हुआ किन्तु महेश को प्राप्त होने वाले परमानन्द को कोई नहीं जान पाया। गीता में जब भगवान् श्रीकृष्ण से अर्जुन ने पूछा था कि जब कोई तपस्वी अपनी तपस्या पूरी नहीं कर पाता है और बीच में ही उसकी मृत्यु हो जाती है तो ऐसे योगभृष्ट तपस्वी की क्या गति होती है। सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण ने बताया कि जिन तपस्वियों की तपस्या पूरी होने से पहले ही मृत्यु हो जाती है उनका अगला जन्म किसी धर्मात्मा कुलीन भक्त के परिवार में होता है वहाँ मैं उस तपस्वी को उसकी अधूरी तपस्या पूरी करने का अवसर प्रदान करता हूं तब वह तपस्वी अपनी अधूरी तपस्या पूर्ण करके मुझे प्राप्त कर लेता है। लगता है कि महेश को भी अपनी अधूरी तपस्या पूर्ण करने का शुभ अवसर भगवान् ने प्रदान किया है। विवाह हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करते ही महेश का विवाह इटावा जनपद के सिरसा गांव के निवासी पंडित विजय बहादुर जी की कनिष्ठ पुत्री शकुन्तला जी के साथ मई सन उन्नीस सौ इक्यावन में कर दिया गया। उस समय शकुंतला जी की उम्र मात्र तेरह वर्ष की तथा महेश जी की उम्र उन्नीस वर्ष थी। इतनी छोटी उम्र में भी शकुन्तला जी अपने पति को परमेश्वर मानकर पूरी निष्ठा के साथ पतिव्रत धर्म का पालन करती थीं। उनकी अपार पति भक्ति देखकर एक दिन महेश जी ने उनसे पूछा कि अभी आप मात्र तेरह वर्ष की ही हैं। आपकी माता जी की मृत्यु आपके बचपन में ही होगयी थी। आपको उनकी याद भी नहीं है कि वे कैसी थी। आपकी भाभी जी भी अभी बहुत छोटी हैं वे भी अभी मात्र चौदह वर्ष की ही हैं। आपको इस पतिव्रत धर्म का गूढ़ रहस्य किसने बतलाया। शकुन्तला जी ने कहा कि बचपन में मेरे बड़े भाई ने सती अनुसुइया नामक फिल्म दिखलाई थी। उसमें सती अनुसुइया जी के कठिन पतिव्रत धर्म तथा तप को देखकर मैं बहुत प्रभावित हुई थी। तभी मैंने हृदय में दृढ़ निश्चय कर लिया था कि मेरा विवाह होने पर मैं भी सती अनुसुइया जी की भांति ही अपने पति देव को परमेश्वर मानकर उनकी सेवा कर के पतिव्रत धर्म का पालन करुंगी। राजकीय सेवा सन 1954 में एक सामान्य युवा की भांति ही महेश जी का चयन उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन ग्राम विकास विभाग में होगया। वहां छत्तीस वर्ष से अधिक सेवा करते हुए सन 1990 में अपर परियोजना निदेशक पद से सेवानिवृत्त होकर 10/223 आनंद नगर शुक्ला गंज उन्नाव उ प्र में निवास करने लगे। भगवान् के चतुर्भुज रूप के दर्शन जब महेश जी विकास खंड सरसौल कानपुर में खंड विकास अधिकारी पद पर कार्यरत थे तभी अचानक वे बहुत बीमार हुए और उन्हे उर्सला अस्पताल में भर्ती कराया गया। लगता था कि उनका प्राणान्त हो जायेगा। उसी समय भगवान् चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए। महेश जी ने अपनी पत्नी से कहा कि मैं तो इस संसार को छोड़कर जारहा हूँ। आप मेरे साथ ही चलेगी या बाद मे आयेंगी। पत्नी ने कहा कि पहले घाट वाले बाबा महाराज से पूछ लूं। वे जैसा कहेंगे वैसा ही किया जाये। उन्होंने बाबा महाराज का आवाहन किया। उन्होंने प्रकट होकर कहा अभी महेश को यहीं पृथ्वी पर रहकर बहुत महान कार्य करना है। इतना कहकर बाबा महाराज अन्तर्धान होगये। चतुर्भुज रूप भगवान् जी महेश जी के पास लगभग डेढ़ घंटे तक रहे। उस समय महेश जी को परमानन्द प्राप्त होरहा था। उनके अन्तर्धान होते ही महेश जी व्याकुल हो गये। रोग मुक्त हो कर वे राजकीय सेवा में व्यस्त हो गए किन्तु सेवा निवृत्त होने तक वे यह नहीं जान सके कि कौन सा महान कार्य करने के लिए बाबा महाराज ने आदेश दिया था। छन्द रामायण छन्द भागवत आदि अनेक ग्रन्थों की रचना सेवा निवृत्त होने के बाद अभी कुछ दिन ही व्यतीत हुए थे। सन 1991 के श्रावण मास का पहला सोमवार था। यह अद्भुत संयोग ही था कि उस दिन श्रावण कृष्ण पक्ष की तृतीया तदनुसार गोस्वामी तुलसीदास जी की पुण्यतिथि थी। महेश जी अपने आवास में बैठे हुए थे तभी उनकी पत्नी शकुंतला जी ने आकर उनसे कहा कि आप मुझे रामकथा सुनाइये। महेश जी ने उनसे कहा मैं तो राम कथा जानता ही नहीं हूं। मैंने रामायण न तो कभी पढी है और ना ही उसे किसी सन्त के मुखारविन्द से सुनने का ही सौभाग्य प्राप्त हुआ है। मुझे राम कथा नही आती है मै आपको नहीं सुना पाऊंगा। यह सुनकर उनकी पत्नी ने कहा आप तो रामायण के रचयिता हैं। पिछले जन्म में भी मैं आपकी पत्नी थीं। आप राम भक्ति प्राप्त करने के लिए मुझे छोड़ कर चले गये थे तब आपने रामायण की रचना की थी। आप काशी में रहते थे। मैं आपको ढूंढती हुई काशी पहुंची थी तब आपने मुझे अपने पास रखने से मना कर दिया था। जब मैंने आपसे मुझे राम कथा सुनाने का आग्रह किया तब आपने मुझे वचन दिया था कि इस जन्म में तो मैं तुम्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर के रामकथा नहीं सुना पाऊंगा। यदि राम जी ने अगले किसी जन्म में हम दोनों को पति पत्नी के रूप में मिलाया तो मैं रामायण की रचना करके तुम्हें अवश्य सुनाऊंगा। महेश जी ने उनसे कहा कि मुझे तो पूर्व जन्म का कुछ भी याद नहीं है। रामकथा मुझको आती भी नहीं है तुमको कैसे सुनाऊं। जब शकुंतला जी ने उनको पूर्व जन्म की बार बार याद दिलाई तो महेश जी के सामने राम कथा छन्द रामायण के रुप में प्रकट होने लगी तथा उन्होंने उसे अपनी पत्नी को सुनाया और उसे लिपिबद्ध किया जो ब्रज भाषा की प्रथम रामायण घोषित हुई। इस पर तत्कालीन राष्ट्रपति जी डा. शंकरदयाल शर्मा जी ने महेश जी को राष्ट्रपति भवन में बुलाकर आदर प्रदान किया। छन्द रामायण की रचना के बाद छन्द भागवत महापुराण छन्द गीता रामचरित मन्दाकिनी सरस रामायण हनुमान रामायण बाल रामायण छन्द गोरखनाथ पुराण विनय की पाती महेश दोहावली आदि अनेक ग्रन्थ प्रकट होगये उन्हें महेश जी ने लिपि बद्ध किया। उनका यश देश विदेश में फैलने लगा। महेश जी के ग्रन्थों पर अनेक विश्वविद्यालयों में शोधकर्ताओं ने शोध करके पी एचडी की उपाधि प्राप्त की है। देश विदेश के अनेक महान व्यक्तियों ने महेश जी की बड़ी प्रशंसा की है। चित्रकूट में वनवासी राम जी के दर्शन महेश जी चित्रकूट में नेत्र बन्द किये हुए सीताराम मंत्र का जप करते हुए कामद गिरि की परिक्रमा कर रहे थे अभी दो मुखारविन्द ही पार कर पाये थे कि सामने से कर्णप्रिय शब्द सुनाई पडा़ रुकिए। महेश जी ने नेत्र खोल दिये तो देखा कि सामने एक बहुत ही सुन्दर सांवले रंग के तपस्वी वेश में तेजस्वी युवा खड़े हुए हैं। उन्होंने महेश जी से पूछा क्या चाहते हो तो महेश जी ने कहा रामजी के दर्शन करना चाहता हूं। यह सुनकर उन्होंने मधुर मुस्कान के साथ कृपा दृष्टि से महेश जी की ओर देखा। ज्यौंही महेश जी ने उनके चरणों में अपना शीश झुकाया वे अन्तर्धान होगये। हनुमान जी के दर्शन महेश जी को दो बार हनुमानजी के दर्शन हुए। प्रथम बार चित्रकूट में कामद गिरि की परिक्रमा करते समय तथा दूसरी बार श्रंगबेरपुर में प्रवास के समय। महेश जी बहुत दुखदायी कैंसर रोग से पीड़ित हो गये थे हनुमानजी ने उनका कैंसर ठीक कर दिया उसके बाद महेश जी ने अनेक ग्रन्थों की रचना की। महान व्यक्तियों द्वारा प्रशंसा तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा जी के भारत रत्न श्री अटलबिहारी वाजपेयी जी सर्वोच्च न्यायालय के सेनि प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री रमेश चंद्र लाहोटी जी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री प्रेम शंकर गुप्त जी उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्पपाल आचार्य श्री विष्णु कान्त शास्त्री जी पद्म विभूषण स्वामी राम भद्राचार्य जी जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपा नन्द जी सहित देश विदेश के अनेक विद्वानों ने महेश जी की प्रशंसा की है। महेश जी अपनी साधना में लीन रहते हैं तथा प्रचार प्रसार से दूर रहते हैं इस कारण उन्हें कम लोग ही जानते हैं। वे न तो किसी को अपना शिष्य बनाते हैं और ना ही किसी से कोई चन्दा या दान स्वीकार करते हैं। विद्वानों द्वारा गोस्वामी तुलसीदास जी से महेश जी की तुलना करना जो विद्वान महेश जी के कृतित्व तथा व्यक्तित्व से परिचित हैं वे महेश जी की तुलना गोस्वामी तुलसीदास जी से करने लगते हैं। लोग जो महेश जी और तुलसी दास जी की समानता बतलाते हैं उसके कुछ उदाहरण नीचे प्रस्तुत कर रहा हूं।
1*गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म यमुना नदी के दाहिने तट पर बसे राजापुर गांव में हुआ था। महेश जी का जन्म भी यमुना नदी के दाहिने तट पर बसे राजा के नौगांव में हुआ था।
2*तुलसीदास जी को उनकी पत्नी के आग्रह पर राम भक्ति प्राप्त हुई तथा उन्होंने रामचरित मानस आदि अनेक ग्रन्थों की रचना की। महेश जी को भी उनकी पत्नी की प्रेरणा से राम भक्ति प्राप्त हुई और उन्होंने छन्द रामायण तथा रामचरित मन्दाकिनी आदि अनेक ग्रन्थों की रचना की।
3*तुलसीदास जी ने गंगा नदी के बांये तटपर काशी जी में बैठकर रामचरित मानस आदि अनेक ग्रन्थों की रचना की थी। महेश जी ने भी बिठूर क्षेत्र में गंगा जी के बांये तट पर बसे शुक्ला गंज उन्नाव में बैठकर छन्द रामायण तथा रामचरित मन्दाकिनी आदि अनेक ग्रन्थों की रचना की है।
4*तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की रचना अस्सी वर्ष की उम्र में की थी। महेश जी ने भी छन्द रामायण के बाद रामचरित मन्दाकिनी की रचना अस्सी वर्ष की उम्र के बाद ही की है।
5*तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की रचना लोकसभा अवधी में की थी। महेश जी ने भी छन्द रामायण छन्द भागवत आदि अनेक ग्रन्थों की रचना लोकभाषा ब्रज भाषा में की है।
6*तुलसीदास जी पर हनुमानजी की विशेष कृपा थी। जब तुलसी की बाहु में भयंकर पीड़ा हुई तो उन्होंने हनुमान बाहुक स्तोत्र की रचना करके हनुमानजी से रोगमुक्त करने की प्रार्थना की तो हनुमानजी ने कृपा करके उनकी बाहु की पीड़ा दूर करदी। महेश जी पर भी हनुमानजी की बड़ी कृपा है। उन्हें कैंसर होगया था। उन्होंने संकट मोचन स्तोत्र की रचना करके हनुमानजी से विनती की तो महेश जी का कैंसर ठीक होगया। हनुमान जी ने साक्षात प्रकट होकर उन्हें अपने दर्शन भी दिये।
7*तुलसीदास जी को चित्रकूट में रामजी के दर्शन हुए थे। महेश जी को भी चित्रकूट में वनवासी रामजी के दर्शन हुए।
8*तुलसीदास जी द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रंथ रामचरित मानस बरवैरामायण विनय पत्रिका दोहावली कवितावली आदि हैं। महेश जी द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रन्थ रामचरित मन्दाकिनी छन्द रामायण छन्द भागवत विनय की पाती छन्द गीता महेशदोहावली आदि हैं।
9*तुलसीदास जी की रामचरित मानस पर काशी में बाबा विश्वनाथ जी सही का चिन्ह अंकित करदिया था। महेश जी की छन्द रामायण पर भी उज्जैन में महाकालेश्वर जी स्वास्तिक का चिन्ह अंकित कर दिया है।
10*तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरित मानस पर पहली पीएचडी नागपुर विश्वविद्यालय में हुई थी। महेश जी द्वारा रचित छन्द रामायण पहली पीएचडी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय काशी में हुई।इस तरह लोग महेश जी की तुलना गोस्वामी तुलसीदास जी से करने लगते हैं।

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